
“वे सच्चे गांधीवादी थे. उन्होंने जो काम कुष्ठरोग से पीड़ित लोगों के उद्धार के लिए किया है, उसने उन्हें महान राष्ट्रीय नेताओं की एक अलग ही श्रेणी में पहुँचा दिया." मनमोहन सिंह : प्रधानमंत्री, भारत सरकार
महात्मा गांधी की कर्मभूमि रही वर्धा के छोटे से गांव हिंगनघाट में 26 दिसंबर, 1914 को एक और गांधी का जन्म हुआ। जिसका नाम था मूरलीधर देवीदास आम्टे। महाराष्ट के बड़े जागीरदार घराने में पैदा हुए मुरलीधर का शुरूआती जीवन बहुत ही रईसी में बीता। किशोरावस्था में फिल्मों के प्रति गहरा लगाव था जिसके फलस्वरूप मूरलीधर ने फिल्म मैगजीन “पिक्टर गोयर” के कई लेख भी लिखे। यहाँ तक हिरन और जंगली सुअर का शिकार करने से भी नहीं चूके. टेनिस और ब्रिज के उस्ताद थे। बोले तो पूरी मजा नी लाईफ थी लेकिन वरोरा के प्रसिद्ध वकील की मज़ा नी लाइफ को एक शाम ने बदल कर रख दिया।
एक शाम मूरलीधर मूसलाधरा बारिश में अपने घर जा रहा था। राह चलते उसने देखा कि एक कोढ़ी धुआँधार बारिश में भींग रहा है लेकिन उसकी सहायता के लिए कोई आगे नहीं आ रहा है। हर कोई खोखली मान्यताओं में जकड़ा हुआ उसकी मदद के लिए कतरा रहा था। मूरलीधर ने सोंचा कि अगर इसकी जगह मैं होता तो? इस सवाल से मूरलीधर का हृदय द्रवित हो गया और उनके नेत्रों से अश्रुधारा प्रवाहित होने लगी। इस प्रसंग ने मूरलीधर देवीदास आम्टे को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने रईसी की सारी चीजों को छोड़कर कुष्ठ रोगियों के लिए कुछ करने की ठानी। उन्होंने कुष्ठ रोगियों की सेवा के लिए 1949 में महारोग सेवा समिति की और उसी दिन से कुष्ठरोगियों की सेवा में जुट गए। उ
मूरलीधर में गहरी लगन थी, तो उन्होंने रास्ता भी खोज ही लिया. उन्होंने कुष्ठ रोगियों के रहने के लिए एक आश्रम की परिकल्पना की। अपने इस सपने को साकार करने के लिए मूरलीधर ने अपनी सहधर्मिणी साधनाताई, दो पुत्रों, एक गाय एवं सात रोगियों के साथ मिलकर बरोरा के जंगल की राह पर चल दिया। वहाँ की बंझर भूमि पर ‘आनन्दवन’ नाम के आश्रम की स्थापना की। मूरलीधर देवीदास आम्टे और उनके सहयोगियों के कठिन श्रम से इस घने जंगल में मंगल होने लगा। जमीन को समतल और उपजाऊँ बनाया गया, कुएँ खोदे गए, पेड़ लगाए गए, बीज बोए गए और कुष्ठरोगियों के हृदय में भी खुशहाल जीवन की आशा पनपाई गई। यहीं से मूरलीधर देवीदास आम्टे बाबा आम्टे के रूप में प्रसिद्ध हुए। बाबा के आनंदवन की महत्ता चारों और फैलनें लगी, दूर दूर से रोगी यहाँ आने लगे। बाबा के आश्रम में किसी प्रकार का कोई भेदभाव नहीं है। आनंदवन का सारा कार्य कुष्ठ पीड़ित जनों द्वारा ही किया जाता है। यहाँ पर सभी लोग श्रम ही पूजा मैं विश्वास करते है, राम के नाम पर कत्ल और हिंसा नहीं बल्कि ‘श्रम ही है श्रीराम हमारा’ का महामंत्र गुंजता है। आज आनंदवन में स्वस्थ, आनंदमयी और कर्मयोगियों की एक बस्ती बस गई है। भीख मांगने वाले श्रम के पसीने की कमाई उपजाने लगे है। किसी समय 14 रूपये में शुरू हुआ आनंदवन आज 180 हैक्टेयर के क्षेत्र में अपनी आवश्यकता की हर वस्तु स्वयं पैदा कर रहा हैं। महाराष्ट्र में, नागपुर के निकट आनंदवन में उनके द्वारा शुरू की गयी सामुदायिक विकास परियोजना में कोढ़-पीड़ितों के प्रति होने वाले दुर्व्यवहार और पक्षपात को मिटाने के लिये किए गए सराहनीय सफल प्रयास के लिए 1971 में पद्मश्री, 1986 में पद्म विभूषण, 1988 में मानवीय हक पुरस्कार, 1995 में रैमन मैग्सेसे पुरूस्कार के साथ ही 1999 में ‘श्रमिक विद्यापीठ’ की संकल्पना हेतु महात्मा गाँधी शांति पुरूस्कार के साथ ही अनेक पुरूस्कारों से सम्मानित किया गया। बाबा आम्टे ने पुरूस्कार से प्राप्त संपूर्ण राशि को आश्रम की सेवा में लगाया।
बाबा आम्टे का पीड़ित जनों की सेवा का मिशन आनंद वन तक ही सिमटा नहीं बल्कि उन्होंने "आनन्दवन" के अलावा और भी कई कुष्ठरोगी सेवा संस्थानों जैसे, सोमनाथ, अशोकवन आदि की स्थापना की, जहाँ हजारों रोगियों की सेवा की जाती है और उन्हें रोगी से सच्चा कर्मयोगी बनाया जाता है। बाबा आम्टे ने कोढ़ पीड़ित रोगियों की सेवा में अपना संपूर्ण जीवन लगा दिया यहाँ तक कि उन्होंने अपने शरीर को भी कोढ़ का निदान पाने की दिशा में किये जाने वाले प्रयोगों के लिये प्रस्तुत कर दिया. बाबा आमटे ने वर्ष १९८५ में कश्मीर से कन्याकुमारी तक तथा वर्ष १९८८ में अरुणाचल प्रदेश से गुजरात तक ‘भारत जोड़ो’ आंदोलन भी चलाया जिसका उद्देश्य था देश को एकता के सूत्र में पिरोना, शांति की स्थापना तथा पर्यावरण के प्रति जागरूकता का प्रसार.
महात्मा गाँधी और विनोबा भावे से प्रभावित बाबा आम्टे ने सारे भारत का दर्शन किया है और इस दर्शन के दौरान उन्हें गरीबी, अन्याय आदि के भी दर्शन हुए और इन समस्याओं को दूर करने की अपराजेय ललक रूपी जलधि इनके हृदय में हिचकोरे लेने लगा। कितने ही रोगियों के पतझड़-जीवन में सावन की समा घोलनेवाले, खुशहाली रूपी सुगंध से उनके जीवन को गमकानेवाले बाबा आम्टे आज भी अपने कर्तव्य-पथ पर एक अथक और कर्मवीर योद्धा को भारतीय छात्र संगठन शत-शत नमन करता है। उनके संघर्ष, समर्पण और निस्वार्थ सेवा भाव से हमें सदा प्रेरणा मिलती रहें।
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